शौक-ए-दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर। स्कूल की मिट चुकी तमाम स्मृतियों में से एक यही लाइन बची रह गई। बाकी आज तक नहीं समझ पाया कि दस बारह सालों तक स्कूल क्यों गया? बरसो से मन में कई बातों का तूफ़ान चल रहा है. दिल करता है की अब उसे शब्दों के पिरो दूँ . ब्लॉग के मंच पर पेश है मेरी अभिव्यक्ति.
शनिवार, 24 सितंबर 2011
ये भी सोचिये
”काम करने से नहीं, चमचागिरी से बची रहती है नौकरी”
‘मूंगफली तोड़नी नहीं और पगार छोड़नी नहीं’ के सिद्धांत पर चलने वाला कर्मचारी ही जीवन में सच्चे कामचोर का दर्जा पा सकता है। हालांकि इससे नुकसान होते हैं, लेकिन कामचोरी जैसे परम आनंद के आगे सबकुछ फीका पड़ जाता है। यही काम अगर बॉस की निगरानी, कहने का मतलब शागिर्दी में हो, तो क्या कहना। हनुमंत शुक्ला ऐसे ही बॉस हैं, जिन्हें ‘ऐसा कोई सगा नहीं, जिसको हमने ठगा नहीं’ की उपाधि और उपलब्धि इंटर में पढ़ाई के दौरान ही हासिल हो गई थी। नौकरी में आते-आते आलसी भी हो गए। आलसी भी इतने कि सड़क पर उबासी लेने के दौरान कोई बदतमीज चिड़िया अगर बीट कर दे, तो जब तक नगर निगम का कर्मचारी माफी मांगने के साथ उनका मुंह न धुला दे। आगे नहीं बढ़ते। कई बार ऑफिस लेट आने का हनुमंत शुक्ला का यह बहाना मैनेजमेंट के सामने बिलकुल सटीक बैठा है, ‘क्या बताऊं, आज मेरा पैर गऊ माता के द्रव्य प्रसाद पर पड़ गया, इसलिए मीटिंग में नहीं आ सका।’ इस पर कोई यह सवाल भी दाग सकता है, ‘पैर धोकर भी आ सकते थे ऑफिस। भाई कौन ऐसे अपवित्र हो गए थे कि गंगा नहाने जैसा काम करना पड़ा। ‘ … लेकिन बॉस होने के कारण हनुमंत शुक्ला को समझाना हाथी को बाथरूम में नहलाने जैसा है। अगर कोशिश करूं तो हाथी को बाथरूम में नहला भी सकता हूं, लेकिन बॉस को समझाना…। ‘न बाबा ना, क्योंकि बॉस इज ऑलवेज राइट। अगर बॉस अनजाने ही घोड़े को घोड़ी कह दे, तो बॉस को समझाने की बजाय घोड़े का लिंग बदलवाना ज्यादा फायदे का सौदा होता है।
कर्मचारी का चोला उतारकर बॉस का पद पर पाए ज्यादा दिन नहीं हुआ है। हनुमंत शुक्ला बॉस होने के साथ थोड़े दिन इस अकड़ में रहे कि ‘मैं बॉस हो गया हूं।’ थोड़े दिनों तक हनुमंत शुक्ला ने अपने जूनियर और सबोर्डिनेट के सामने ऐसी हनक दिखाई कि उनका टैरर मैनेजमेंट को खुश कर गया। उन्हें देखकर लोग जल्द ही बॉस की परिभाषा कुछ इस तरह देने लगे, ‘थोड़ी सी अकड़ + बदतमीजी + प्रमोशन से दिमाग खराब = बॉस होता है।’ जल्द ही हनुमंत शुक्ला का यह भ्रम टूट गया, जब जबरदस्त पैरवी पर उनके भी बॉस आ गए। व्यवहार मे वे उसके भी बॉस या कहें बाप निकले। यही से हनुमंत का अंगुलिमाल की तरह हृदय परिवर्तन हो गया। … और बहुत जल्द उन्हें यह अहसास हो गया कि आखिरकार मैं भी एक कर्मचारी हूं। कहावत भी है, ‘कुत्ते के दिन आते हैं और जाते भी है और ऊंट की औकात तब तक, जब तक कि उससे ऊंचा पहाड़ नहीं मिलता।’
बस यहीं से हनुमंत ने अपने बॉस को मक्खन लगाना शुरू कर दिया। और देखते-देखते वे फिर से आला दर्जे के कामचोर हो गए। जल्द ही ‘मूंगफली तोड़नी नहीं, पगार छोड़नी नहीं’ के सिद्धांत को नैतिक शिक्षा की तरह अपने जीवन में उतार लिया। इस तरह हनुमंत से बॉस और जूनियर दोनों खुश। पिछले तीन साल से वे एक ही जगह टिके हुए हैं, बिना कोई काम किए। साथ में तीन प्रमोशन भी मिल चुका है। हनुमंत को प्रमोशन क्यों और कैसे मिले? यह सवाल कौन बनेगा के लिए सुरक्षित है, जिसमें प्रतियोगी से सवाल किया जाएगा। हनुमंत शुक्ला को प्रमोशन को प्रमोशन किस आधार पर मिला?
ऑप्शंस
ए- चाटुकारिता
बी- चमचागिरी
सी- मक्खनबाजी
डी- इनमें से सभी
इस अंतिम सवाल का सही जवाब देकर एक प्रतियोगी करोड़पति हो जाएगा।
खैर, अब हनुमंत शुक्ला के नक्श-ए-कदम पर चलते हुए उनके जूनियर भी चमचागिरी के नए पायदान चढ़ रहे हैं। और जो नहीं चढ़ रहे हैं, उन्हीं के दम से ऑफिस की इज्जत बची पड़ी है। वरना हनुमंत अपने बॉस की नजर में कुख्यात कर्मी हैं और उन्हें दो बार सर्वश्रेष्ठ कर्मचारी का खिताब भी मिल चुका है। दरअसल, हनुमंत काम करने के दौरान काम चालू रखने का ऐसा माहौल तैयार करते हैं और इस दौरान खूब शोर करते हैं। इस गलती पर इस चीखे, उस गलती पर उस पर चीखे… यह सब करने के दौरान काम ठप पड़ जाता है। इससे साथी कर्मियों और मैनेजमेंट को लगती है कि यही शक्स काम कर रहा है, बाकी सब कामचोर हैं। उन्होंने जो कुछ अनुभव किया, सब अपने जूनियरों को भी सिखा दिया। सीखने-सिखाने का सिलसिला जारी है।
आज ही की घटना को लीजिए। आज हनुमंत शुक्ला ऑफिस में लेट आए। उनके साथी सक्सेना जी ने कहा, ‘सर आपको याद कर रहे हैं।’ हनुमंत भी मूड में थे, सो झनझनाती जवाब भी दे दिया। ‘याद स्वर्गीय को किया जाता है, हम तो अभी जिंदा हैं सक्सेना। सर मुझसे मिलना चाहते होंगे।’ ‘ हां-हां’ कहते हुए सक्सेना हनुमंत के सेंर ऑफ ह्यूमर को ताड़ गए और बेवजह ही ठहाका मार कर हंस पड़े।
उधर, हनुमंत बॉस के कमरे में 12.20 मिनट पर बदहवास दाखिल हुए और बोले, ‘सर गुड मॉर्निंग’ यह सुनकर बॉस को गुस्सा आया, आटे में नमक की तरह। यहां तक तो ठीक था, लेकिन वाटर प्रूफ से लैस बॉस के हाथ में बंधी घड़ी, भरी दोपहरी में 12.20 मिनट पर ‘सर गुड मॉर्निंग’ सुनकर पानी-पानी हो गई, गनीमत रही कि खराब नहीं हुई।
इस बीच सुपर बॉस बोले, ‘क्या इरादा है’ हनुमंत तुरंत बोल पड़े, ‘सर सेलरी मिलते ही गर्मी की छुट्टियों में घूमने जाने का इरादा है।’ यह सुनते ही सुपर बॉस की आंखों में चमक आ गई। बोले, ‘ भई हनुमंत मेरे बीवी, बच्चों का भी टिकट करवा देना। मैं भी तुम्हारे साथ चला चलूंगा।’
‘ हो जाएगा सर’। यह कहते हुए हनुमंत सुपर बॉस के केबिन से बाहर निकले और काम में तल्लीन सक्सेना जी को टोकते हुए कहा, ‘सक्सेना जी मैं कुछ दिनों के लिए छुट्टियों पर जा रहा हूं, ऑफिस की जिम्मेदारी मुझ पर है।’
इतना कहने के साथ ही हनुमंत शुक्ला ऑफिस से ऐसे गायब हो गए, जैसे दिन में तारे। ठीक 5 मिनट बाद अपने केबिन से निकले और काम में तल्लीन सक्सेना जी को बिना कोई आदेश दिए निकल गए। सक्सेनाजी ठगे से रह गए। साथियों ने सक्सेना से सहानुभूति जताने की बजाय उन्हें हिकारत भरी नजर से देखा और सभी बाहर निकल गए सुपर बॉस के साथ हनुमंत शुक्ला को हैप्पी जर्नी कहने…
बुधवार, 31 अगस्त 2011
अन्ना के साइड इफेक्ट ..........
लोकपाल बिल पर विचार कर रही संसद की स्थायी समिति से कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी बाहर हो गए हैं। सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे पर टिप्पणी को लेकर सिविल सोसायटी के सदस्य उनसे काफी नाराज थे। इसी नाराजगी के चलते मनीष तिवारी ने खुद को समिति से अलग कर लिया।
मनीष तिवारी ने कहा कि वह मजबूत और सशक्त लोकपाल बिल के पक्ष में हैं। बिल को लेकर जारी चर्चा पर वह कोई विवाद की छाया नहीं पड़ने देना चाहते। गौरतलब है कि तिवारी ने अन्ना के खिलाफ तुम-तड़ाक की भाषा का इस्तेमाल करते हुए उन्हें ऊपर से नीचे तक भ्रष्ट करार दिया था। हालांकि बाद में उन्होंने माफी भी मांग ली थी।
खबर है कि राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और अमर सिंह भी समिति से बाहर हो सकते हैं। अभिषेक मनु सिंघवी 31 सदस्यीय समिति के अध्यक्ष बनें रहेंगे। सूत्रों के मुताबिक जनलोकपाल बिल का विरोध करने वाले सांसदों के खिलाफ टीम अन्ना ने लॉबिंग की है। इन सांसदों में लालू प्रसाद यादव और अमर सिंह का नाम शामिल है। टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल लालू प्रसाद यादव का मजाक उड़ा चुके हैं। समाजवादी पार्टी अमर सिंह को संसदीय समिति से बाहर करने की मांग कर चुकी है।
मनु ने साधीचुप्पी
इस बीच, कांग्रेस के प्रवक्ता और स्थायी समिति के अध्यक्ष अभिषेक मनु सिंघवी ने एक सवाल के जवाब में कहा कि तिवारी के इस फैसले के बारे में उनका कुछ भी कहना उचित नहीं है और यह बात तिवारी से ही पूछी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि स्थायी समिति के पुनर्गठन को लेकर अलग मतलब नहीं निकाले जाने चाहिए। इस समिति के गठन को एक वर्ष हो गया है और अब इसका फिर से गठन किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि समिति के गठन के बारे में वह न तो अध्यक्ष के नाते और न ही सांसद के नाते कुछ कह सकते हैं क्योंकि यह उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर की बात है। उन्होंने कहा कि यह काम राजनीतिक दलों और लोकसभा अध्यक्ष तथा राज्यसभा के सभापति का काम है। उन्होंने कहा कि एक वर्ष के बाद अमूमन सभी स्थायी समितियों का फिर से गठन किया जाता है।
कांग्रेसी सांसद ने कहा था अन्ना को गद्दार
भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन के ठीक एक दिन पहले अन्ना हजारे को कांग्रेसी सांसद ने गद्दार और देशद्रोही बताया था। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर मध्यप्रदेश में देवास-शाजापुर के सांसद सज्जन सिंह की अन्ना पर की गई यह टिप्पणी कांग्रेस पार्टी के लिए सिरदर्द बनती जा रही है। अन्ना समर्थकों की ओर से प्रदेश के राजनैतिक महकमे में कांग्रेसी सांसद के बयान वाली एक सीडी बांटी जा रही है और इस पर बवाल बढ़ता जा रहा है। हालांकि अन्ना के अनशन के दौरान प्रधानमंत्री भी अन्ना को नेशनल हीरो कहने से नहीं चूके थे।
अन्ना हजारे को जहां देशभर में दूसरा गांधी कहा जा रहा है वहीं इस सीडी में कांग्रेसी सांसद सज्जन सिंह वर्मा की नजरों में अन्ना हजारे का आंदोलन देश के साथ गद्दारी है बताया गया है। सीडी में सज्जन सिंह कह रहे है, "हमारे देश को अभी चीन जैसी शक्तियों से खतरा है। उसने पाकिस्तान में बेस बना लिया है। ऎसे में देश की अस्मिता की रक्षा करना हमारे लिए Êयादा अहम है। इस समय कोई व्यक्ति अगर भड़काऊ काम करता है तो मैं उन्हें गद्दार कहूंगा, देशद्रोही कहूंगा।"
मंगलवार, 12 जुलाई 2011
गुरुवार, 7 जुलाई 2011
गुरुवार, 16 जून 2011
सोशल मीडिया की ताकत
अभी तक हम यही समझते रहे हैं कि लोग फेसबुक पर चैट करने वक्त अपने एकाकीपन की बोरियत को खाली कर रहे हैं। ब्लॉगर आत्ममुग्धता का शिकार है। ट्विटर करने वाला बेकार है। सिर्फ इस बात से खुश होना चाहता है कि वह अमुक फिल्म स्टार के ब्लॉग या ट्विटर से जुड़ा है। हिन्दुस्तान में ही लोग महंगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त है। राजनीतिक दलों से उनका विश्वास उठ रहा है तो वो आपस में बात कर रहे हैं। दलों के प्रवक्ता प्रेस कांफ्रेंस में एक दूसरे के बयानों की धज्जियां उड़ाकर खुश हैं। ठीक है कि हिन्दुस्तान में करीब सात करोड़ लोग ही इंटरनेट का इस्तमाल करते हैं। इस सात करोड़ में से ज्यादातर मुंबई,दिल्ली और हैदराबाद जैसे कोई दस महानगरों में ही रहते हैं। फिर भी इनकी ताकत को अनदेखा करना किसी राजनीतिक मूर्खता से कम नहीं है। मैसूर में रामसेने के खिलाफ दिल्ली की एक लड़की ने फेसबुक पर पिंक चड्ढी कैंपने चलाकर अच्छा खासा आंदोलन खड़ा कर दिया था। आज भी फेसबुक पर कई तरह के ग्रुप बने हुए हैं जिनसे हज़ारों लोग जुड़े हुए हैं। ये सभी अल्पकालिक आंदोलनकारी कभी भी पूर्णकालीक आंदोलनकारी में बदल सकते हैं।
आखिर लोग कहां जाए। न्यूज़ चैनलों से आम लोग ग़ायब हैं। कुछ बड़े लोगों के आस-पास ख़बरें घूम रही हैं। उनके इस्तीफा देने या खंडन कर देने भर से पत्रकारिता का महिमामंडन हो जाता है। हिन्दुस्तान में न सही काहिरा और ट्यूनिशिया में उसे एक नया मंच मिल गया है। इसकी ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मिस्र में फेसबुक, ट्विटर, न्यूज साइट पर प्रतिबंध लगा दिया गया। कई क्षेत्रों में मोबाइल सेवाएं बंद कर दी गईं। इससे यह धारणा भी बदल जानी चाहिए कि आंदोलन के लिए राजनीतिक दल या नेता को होना ज़रूरी है। कम से कम ट्यूनिशिया या मिस्र में घोषित तौर पर ऐसा नहीं दिखता। लोग अपनी रोज़मर्रा की दिक्कतों से इतने आज़ि़ज आ चुके हैं कि ट्युनिशिया के दक्षिणपंथी इस्लामी संगठन के पीछे खड़े हो गए। मगर जब विपक्षी दल के नेता देश लौटे हैं तो ऐसे भी नारे लगे कि हमें मज़हब के नाम पर बेतुके कानून नहीं चाहिए।
सबक यह है कि सरकारें प्रेस खरीदने या निंयत्रित करने की कोशिश न करें। लोगों के हाथ में सोशल मीडिया नाम का अस्त्र हाथ लग गया है। ट्यूनिशिया में ही कई ब्लॉगर, नेट आंदोलनकारी जगह-जगह से सूचनाएं और वीडियो अपलोड कर रहे थे। जब तक सरकार उन तक पहुंचती, वे सभी किसी और छद्म नाम से और अधिक लोगों तक पहुंच चुकी होती थीं। सरकारी सेंशरशिप का जवाब मिल चुका है। इंटरनेट तकनीकी की भाषा में इसे साइबरसबवर्ज़न कहते हैं। मतलब आप मेन रोड से नहीं जाने देंगे तो हम गली कूचों से निकल कर गंतव्य तक पहुंच जायेंगे। किसे पता था कि तानाशाहों के मुल्क में सोशल मीडिया लोकतंत्र कायम करने का हथियार बन जाएगा।
इन्हें प्रतिबंधित करने का रास्ता और जोखिम भरा है। ईरान और पाकिस्तान ने भी फेसबुक और यू ट्यूब पर बैन लगा कर देख लिया है। सीरिया में भी फेसबुक के चैट पर रोक लगाई जा चुकी है। चीन में नेट नेशनलिस्ट से सरकार को भी डर लगने लगा है। चीन की विदेश नीति का हिस्सा बनता जा रहा है कि किसी फैसले का इंटरनेट से जुड़े समूह किस तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे। सरकारों को यह समझ लेना चाहिए कि उनके फैसले से आम जनता के बीच बढ़ने वाली खाई किसी भी मंच को राजनीतिक बना सकती है। वो अगर सोशल मीडिया पर अंकुश लगाने की तैयारी में जुटेंगी तो लोग कोई और रास्ता ढूंढ लेंगे। ग्लोबल जगत की पैदाइश ये सोशल मीडिया तथाकथित उदारीकरण से जन्म ले रही असामनताओं को आवाज़ दे रही हैं।
बुधवार, 15 जून 2011
रविवार, 29 मई 2011
बुधवार, 25 मई 2011
शनिवार, 14 मई 2011
शुक्रवार, 6 मई 2011
शोक सन्देश

आप सभी को ज्ञात होगा और अगर नहीं है तो बड़े दुःख के साथ सूचित किया जा रहा है कि जेहाद ( शान्ति दर्शन,धर्म निरपेक्षता ) के भगवान् श्री ओसामा बिन लादेन को कुछ निर्दयी हमलावरों ने हमला करके मौत के घात उतार दिया है जिसके लिए शोक संवेदना व्यक्त करने ...और उसके नाम का स्मारक बनाने कि मांग को लेकर एक शोक सभा और धरना प्रदर्शन का आयोजन किया जा रहा है आप सभी से प्रार्थना है कि शामिल होकर उस महान आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित करें ...... निवेदक - श्री दिग्विजय सिंह( कांग्रेस प्रवक्ता, मंत्री ) शोकाकुल परिवार -- श्री दिग्विजय सिंह, दारुल उलूम देवबंद एवं समस्त भारतीय सेकुलर परिवार
रविवार, 10 अप्रैल 2011
बुधवार, 16 मार्च 2011
क्या कहेंगे .... लौट के बुद्धू घर को आये


सलमान ने फिर थामा सोमी का दामन!
बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान बैंकॉक में फिल्म की शूटिंग कर मुंबई लौट आए हैं। रेडी की शूटिंग कर 40 दिन बाद लौटे सलमान के बारे में खबर है कि उनकी जिंदगी में एक बार फिर पुराने साथी की वापसी हुई है। सलमान और सोमी अली बैंकॉक में एक ही होटल में ठहरे थे। पूरी यूनिट होटल सुकुमविट में ठहरी थी, जबकि ये दोनों होटल लैंडमार्क में ठहरे थे।
बैंकॉक में सोमी सेट पर तो नहीं आती थीं, लेकिन शूटिंग के बाद सलमान अपना सारा वक्त उन्हीं के साथ बिताते थे। अली अमेरिका में रहती हैं। वह फरवरी के आखिर में बैंकॉक पहुंची थीं और सलमान के मुंबई रवाना होने तक रूकी रहीं। सलमान मंगलवार को मुंबई पहुंचे हैं। पिछले दिनों सोमी अली के बारे में खबर आई थी कि वह अमरीका में बॉलीवुड के मस्त बॉय आफताब शिवदासानी के साथ डेटिंग कर रही हैं। बताया जाता है कि सालों पहले सलमान का ऎश्र्या से ब्रेकअप सोमी के चलते ही हुआ था।
ऎश्वर्या ने सलमान को सोमी के साथ सम्बंध तोड़ने के लिए कई बार चेतावनी दी थी। इसके बावजूद जब सलमान ने सोमी का पीछा नहीं छोड़ा , तो ऎश ने सलमान को छोड़ने का फैसला किया। सलमान के करियर और उम्र के अलग-अलग पड़ाव में उनकी अलग अलग गर्लफ्रेंड्स रही हैं। सोमी अली, फिर संगीता बिजलानी, ऎश्वर्या राय, कैटरीना कैफ, ब्रिटिश मॉडल हेजल...।
ऎश-सलमान के इश्क के आखिरी दिनों में सलमान प्रेमिका बदलने को लेकर कुछ ज्यादा ही बदनाम हो गए थे। हालांकि सोमी से अलग होने के बावजूद वे एक-दूसरे से मिलते रहे थे। करीब 10 साल पहले जब इनकम टैक्स वालों ने सलमान के घर पर छापा मारा था तो सोमी अली के बैंक अकाउंट के कागजात भी वहां मिले थे। सोमी अली से भी पहले सलमान खान का नाम सबसे पहले मॉडल शाहीन जाफरी से जुड़ा था। तब सलमान फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर थे।
शाहीन ने उनके स्ट्रगलिंग दौर में उनका साथ दिया मगर सलमान जैसे-जैसे सफलता की सीढ़ी चढ़ते गए वह शाहीन से दूरी बनाते गए और एक दिन उन्होंने शाहीन को धोखा देकर संगीता बिजलानी को अपनी गर्ल फ्रेंड बना लिया।सलमान-संगीता ने साथ में कोई फिल्म में काम नहीं किया मगर इन दोनों का लव अफेयर उन दिनों सबसे ज्यादा चर्चित हुआ था। हां उन्हें ग्रासिम ग्रेवियेरा शूटिंग शटिंüग के विज्ञापन में जरूर साथ देखा गया था।
सलमान संगीता का इश्क इतना परवान चढ़ चुका था कि बात शादी तक जा पहुंची थी। मगर तभी सलमान की जिंदगी में पाकिस्तानी अभिनेत्री सोमी अली आ गईं और सलमान ने संगीता को छोड़ दिया। हालांकि कुछ ही समय बाद बॉलीवुड में करियर बनाने की कोशिश कर रहीं सोमी से भी सलमान का साथ छूट गया। वह उस समय सलमान से शादी करना चाहती थीं मगर सलमान शादी के मूड में बिलकुल नहीं थे। तब वह सब कुछ छोड़ कर मां के पास फ्लोरिडा चली गईं। सोमी के बाद सलमान की जिंदगी में कई लड़कियां आईं और चली गईं।














