गुरुवार, 29 सितंबर 2011

शनिवार, 24 सितंबर 2011

खबरों को ऐसे भी देखिये

-कलमाडी , चव्हाण बेकसूर : दिग्विजय


मेरी नज़र :- आयं ,अरे पूछ रहे हैं कि बता रहे है हो बिजय जी ..धू महाराज । आप एतना न जादे बकवास करते हैं कि कसम से ई पते नय चलता है कि आखिर ओतना बकवास के बीच आप कुछ बोलते भी हैं कि खाली बकवासे करते हैं । मामा कलमाडी और चचा चव्हाण दुन्नो के दुन्नो मासूम , बेकसूर और , अरे और छोडिए ..माने समझिए कि ..इन्नोसेंट है जी । तो फ़िर जो पिछला दिनों घपटा घटोला हुआ था , अच्छा , वो सब , । अरे ऊ तो इसलिए काहे से कि ..अरे अब आप लोग भी न , एतना एतना पैसा कोई अकेले खाता है कभी
-----
डीएनए परीक्षण से इंकार पर जवाब दें , एन डी तिवारी


मेरी नज़र :-ओह टिवाडी जी इंकार कर दिए , हां तो का करेंगे , पहिले इतना न स्वीकार करते रहे हैं , स्वीकार , अंगीकार , एकाकार , इन द कार , माने हर रूप का कार किए कि मने अघा गया , लो तो माने ई क्या मतलब हुआ , आदमी का मन अघा नय सकता है क्या ? तो अघाते ही इंकार करने लगे हैं ।उनका कहना है कि अब परीक्षण और प्रयोगों से वे दूर रहना चाहते हैं , अब इस उम्र में चाहे छुप कर ही सही डीएनए परीक्षण से अच्छा है कि , कपालभारती करे , इसलिए वे कोई भी स्पष्टीकरण न दे सकेंगे , आप आगे बढें , लेकिन रुकिए अगर आप चाहते हैं कि कोई कुछ बोले ..तो दिग्गी इज देयर ..आलवेज़ रेडी ..ढिंका चिका ढिंगा चिका ए ए ए अरे ए ए ए
-------
मुंबई के हमलावरों को सजा दे पाक


मेरी नज़र :- हा हा हा हा अबे कसाब का मुकदमा पेशावर शिफ़्ट कर रहे हो क्या बे भाई लोगों ..नहीं ..तो मुंबई के हमलावरों को पाकिस्तान क्या घंटा सजा देगा जब साले तुम अपने ही देश में उसे दामाद बना के एक कोर्ट से दूसरा कोर्ट का टूर ट्रिप पे ले कर चल रहे हो बे । और पाकिस्तान का खाक सजा देगा ...जब उनका घर में छुप्पल ..लादेनवा को भी ....अमरीका को ही सजा देना पडा जाके । हुंह्ह .,....मुंबई के हमलावरों को ...अबे किस किस के हमलावरों को उनके हाथों सजा दिलवाओगे ....संसद पर हमलावरों को , मुंबई के हमलावरों को , दिल्ली के हमलावरों को ......पाकिस्तान को पूरा टाईम टेबल बना के दे दो रे
-------
धूल में मिला दिया जाएगा ओसामा का शानदार घर


मेरी नज़र :-नहींईईईईईईईईईईईईईईईईईईईई .....अईसे ही लादेनवा का टप्पर और पाकिस्तान में उसका फ़ैनवा सब चिचियाया होगा ..लेकिन इससे अलग हमरे दिमाग में तो आयडिया आ रहा रहा है कि ..पाकिस्तान से ई शानदार घर ..भाडा पर ले लिया जाए ..और अपने पडोस के राजकीय मेहमान , श्री अजमल जी कसाब जी ( दिगविजय जी की भावना जी का सम्मान जी करते हुए जी ) को वहां शिफ़्ट करा के उनको होमली फ़ील कराया जाना चाहिए । देखिए मेन बात है कि हमें दुनिया को दिखा देना चाहिए कि हम इंसाफ़ दिलाने के नाम पर एक दरिंदे को पाले रखते हैं ,चाहे उस पैसे से कितने ही भूखों का पेट भर जाए
----------
भारत ने पाक से फ़िर मांगे दाउद समेत पच्चीस वांछित


मेरी नज़र :-मांगो एकदम हक से मांगना ही चाहिए देखे नहीं पिछला कै साल से अमरीका भी पाकिस्तान से लादेन मांग रहा था और पाकिस्तान भी अमेरिका से मांग रहा था ...अरे डॉलर और क्या मांगेगा भिखमंग्गा साला । लेकिन अपना नेताजी लोग को देखिए , भिखमंगा के सामने ही कटोरी ले के बार बार खडे हो जाते हैं ..कभी बीस वांछित तो कभी पच्चीस वांछित ..जईसे ऊ दे ही देगा ..अरे चोट्टा है चोट्टा ..अमेरिका को भी विश्वास नहीं है उसपे ..और आपको तो दईए देगा लप्प से
------
मनरेगा में भ्रष्टाचार लाइलाज : योजना आयोग





मेरी नज़र :- हा हा हा हा ..बाह बाह ..ई हुई न बात ....कभी प्रधानमंत्री जी कभी मोंटेक जी ...इंस्टॉलमेंट में अपना अपना मजबूरी को बयान कर रहे हैं ....क्या बात है वाह ? देखिए जी आयोग जी ...अब आप अपना ये मजबूरी का राग अलापते रहिए ..लेकिन अब जनता ने ई जो आप लोगों का मनरेगा मनोरोग ..जिसको आप लोग लाइलाज बनाए और बताए हुए हैं न चोर जी .....अब जनता आप लोगों के गले में ऐसा जंतर बांध के ऐसा न मंतर फ़ूंकने की तैयारी में हैं कि आप अपने मजबूरी समेत ..लुढक लेंगें ..आखिर क्या किया जाए ..कित्ते न मजबूर हैं आप लोग ...तो घर बैठ जाइए न अब ..जनता सडकों पर आ चुकी है ...और जब जनता सडकों पर आती है न तो नेता सडक पर भीख मांगने लायक भी नहीं बचता .....समज गए न ....नहीं...........मेंटॉस खाओ ..दिमाग की बत्ती जलाओ ,...वर्ना जनता तो जला ही देगी ...
------
सीमा पर फ़िर जुटी चीन की सेना





मेरी नज़र :-भई ये चीन की सेना बहुत मेहनती है जब तब सीमा पर आ जुटती है ...कभी वहां लगे पत्थरों पर लाल रंग से कुछ लिख जाती है ..तो कभी कोई और कारनामा कर जाती है ..और सेना ही क्यों वहां के मानचित्र बनाने वाले भी कोई कम मेहनती नहीं हैं ..वे भी हर साल नया मानचित्र तैयार करते हैं ..जबकि धरती के आकार में कोई बदलाव नहीं होता मगर वे पट्ठे कर डालते हैं ..कभी मणिपुर पेंटिंग बना डालते हैं तो कभी नागालैंड पेंटिंग ..वैसे मुझे लगता है कि इस बार वे जरूर ही भारत की बढी हुई जनसंख्या के कारण ये चैक करने आए होंगे कि हमारा स्कोर कितना हुआ है ...

ये भी सोचिये

आज विश्च अर्थव्यवस्था में बेशक भारत का स्थान और मुकाम ऐसा हो गया है कि उसकी हठात ही उपेक्षा नहीं की जा सकती दूसरा बडा सच ये है कि भविष्य की शक्तशाली अर्थव्यवस्थाओं में भी भारत की गणना की जा रही है देश मेंबढते हुए बाज़ार की संभावनाओं के मद्देनज़र ये आकलन बिल्कुल ठीक जान पडता है आज देश चिकित्सा, विज्ञान , शोध , शिक्षा आदि हर क्षेत्र में निरंतर विकास की ओर अग्रसर है किंतु इसके बावजूद भारत की गिनती धनी संपन्न राष्ट्र में अभी नहीं की जा स्कती है आज भी देश का एक बहुत बडा वर्ग शिक्षा , गरीबी , और यहां तक कि भूख की बुनियादी समस्या से जूझ रहा है । आज भी देश में प्रति वर्ष सैकडों गरीबों की मृत्यु भूख और कुपोषण से हो रही है , जिसके लिए थकहार कर सर्वोच्च न्यायालय को सरकार को सख्त निर्देश देने पडे ।

इस स्थिति में जब आम जनता ये देखती है कि एक तरफ़ सरकार रोज़ नए नए करों की संभावनाएं तलाश कर राजकोष को भरने का जुगत लगाती है । वहीं दूसरी तरफ़ वो संचित राजकोष के धन की बर्बादी के प्रति न सिर्फ़ घोर उदासीन है बल्कि इसमें दोहरी सेंधमारी किए जा रहे हैं । पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक भ्रष्टाचार , घपले , घोटाले किए जाने के लिए एक अजीब सी रेस जैसी लगी हुई है । किसी को न तो किसी कानून का भय है न ही जनता की भावना और विश्वास की फ़िक्र । यदि घपलों -घोटालों को थोडी देर के लिए आपराधिक कृत्य की श्रेणी में रखकर व सभी राजनीतिज्ञों को इसमें सम्मिलित नहीं मानते हुए भी यदि कुछ तथ्यों पर गौर करें तो वो स्थिति भी आज कम भयावह नहीं है ।

समाजसेवा का पर्याय मानी जाने वाली राजनीति आज न तो समाज के करीब रही न सेवा के । भारत जैसे गरीब देश में भी आम चुनाव के नाम पर जितना पैसा खर्च किया जाता है यदि उसका आकलन किया जाए तो लगभग उतने पैसों से कम से कम दो शहरों का संपूर्ण विकास किया जा सकता है । एक वक्त हुआ करता था जब देश के सबसे बडे पदों पर बैठे प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक अपने वेतन को हाथ भी नहीं लगाते थे । अब इन आदर्शो और मूल्यों का कोई अर्थ नहीं है । आज जनसेवा के लिए बने और बनाए ओहदों में से कोई भी वेतन-भत्तों , सुख सुविधा अधिकारों के बिना नहीं है । आज इन तमाम जनप्रतिनिधियों को न सिर्फ़ वेतन के रूप में मोटी रकम दी जा रही है बल्कि यात्रा भत्ता, बिजली , पानी , दफ़्तर का रख-रखाव आदि के नाम पर लाखों रुपए की रियायत दी जाती है । न सिर्फ़ इन जनप्रतिनिधियों पर बल्कि इनसे संबंधित सभी विभागों , संस्थाओं इनसे जुडे सुरक्षा अधिकारियों के लाव लश्कर इत्यादि पर भी भारी भरकम खर्च किया जा रहा है । सबसे अधिक दुख की बात ये है कि सारा खर्च उसी पैसे से किया जा रहा है जो सरकार प्रति वर्ष नए नए कर लगाकर आम आदमी से वसूल रही है ।

इन जनप्रतिनिधियों से आज आम जनता को दोहरी शिकायत है । पहली शिकायत तो ये कि इतना सुविधा संपन्न कर दिए जाने के बावजूद भी ये अपने कार्य और दायित्व को निभाना तो दूर इनमें से बहुतायत प्रतिनिधि तो निर्धारित सत्र तक में भाग नहीं लेते हैं । स्थिति ऐसी है कि प्रति वर्ष विभिन्न सत्रों के दौरान बाधित की जाने वाली कार्यवाहियों का दुष्परिणाम ये निकलता है बनने वाले कानून भी सालों साल लटकते चले जाते हैं या कि जानबूझ कर ऐसे हालात बनाए जाते हैं कि उन कानूनों को पास करने से बचा जा सके । इससे अलग इन विभिन्न सत्रों के दौरान किया गया सारा खर्च व्यर्थ चला जाता है । इस दौरान हुए खर्च का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है इस दौरान कैंटीन में उपलभ्द कराए जाने वाले भोजन की थाली की कीमत पांच या दस रुपए होती है जबकि वास्तव में उसकी कीमत उससे तीस चालीस गुना अधिक होती है । न सिर्फ़ भोजन बल्कि प्रति वर्ष इन जनसेवकों को जाने क्या सोच कर रियायती दरों और मुफ़्त बिजली , पानी , यात्रा आदि की सुविधाएं दी जाती हैं , जबकि इसका हकदार सबसे पहले देश का एक गरीब होना चाहिए ।


अब समय आ गया है कि जनता को , अपने जनप्रतिनिधियों से अपेक्षाएं बढानी चाहिए , उनसे पूछा जाना चाहिए कि आखिर कौन सी न्यूनतम योग्यता है वो जो उन्हें आपका प्रतिनिधि बनाने के काबिल बनाती है । इन तमाम जनसेवकों के काम का रिपोर्टकार्ड जनता को तैयार करना चाहिए और उसीके आधार पर उन्हें न सिर्फ़ उनका वेतन , उनके अधिकार बल्कि आगे बने रहने का हक भी , सिर्फ़ और सिर्फ़ जनता ही निर्धारित करे । अब ये बहुत जरूरी हो गया है कि जनसेवकों को ये समझाया जाए कि देश का प्रतिनिधि वैसा ही रहेगा , करेगा जैसा कि देश की जनता रहती सोचती है । एक सेवक को हर हाल में अब स्वामी और तानाशाह स्वामी बनने से रोकना ही होगा

अस्वाभाविक -असामयिक मौत का सिलसिला ..

अस्वाभाविक -असामयिक मौत का सिलसिला ..




चित्र गूगल से साभार ,माफ़ी सहित लेकिन हकीकत यही है आज




किसी भी दिन का समाचार पत्र उठा कर देखा जाए तो एक खबर जरूर रहती है वो है दुर्घटना , अपराध , बीमारी आदि के चपेट में आकर हो रही अस्वाभाविक मौत की खबरें । पिछले एक दशक में इन मौतों का सिलसिला इतना बढ गया है अब ये एक चिंताजनक स्तर तक पहुंच गया है । भारतीय समाज न सिर्फ़ मानव संसाधन के दृष्टिकोण से बल्कि विशेषकर युवाओं की उपस्थिति के कारण पूरे विश्व समुदाय में महत्वपूर्ण स्थिति में है । ऐसे में सडक दुर्घटनाओं में , नशे और अपराध में बढती उनकी संलिप्तता के कारण तथा खिलंदड व लापरवाह जीवन शैली की वजहों से रोजाना न सिर्फ़ इन आमंत्रित मौतों का सिलसिला बढ रहा है बल्कि इसकी दर इतनी तेज़ गति से बढ रही है कि भविष्य में ये बेहद आत्मघाती साबित हो सकती है ।

इस विषय पर शोध कर रही संस्था "लाईफ़ डिसएपियरिंग " ने पिछले दिनों अपनी सूचनाओं के आधार पर बहुत से चौंकाने वाले तथ्य और आकडे सामने रखे । आंकडों के अनुसार पश्चिमी और पूर्वी देशों में होने वाली अस्वाभाविक मौत के कारण भी सर्वथा भिन्न हैं । पश्चिमी देशों में नशे की बढती लत , आतंकई घटनाएं , व कैंसर एड्स जैसी बीमारियों की चपेट मेम आकर प्रतिवर्ष हज़ारों लोग मौत के मुंह में समा जाते हैं । इसके अलावा एक बडा और प्रमुख कारण खतरनाक शोध कार्यों व दु:साहसिक खेलों का खतरा उठाना भी रहता है इसमें ।


भारत व अन्य विकासशील देशों में सडक दुर्घटनाओं , मानवीय आपदाओं , आतंकी हमलों के अलावा अपराध मेम लिप्तता के कारण प्रतिदिन सैकडों व्यक्तियों को अपने जीवन से हाथ धोना पड रहा है । इससे अलग बिल्कुल गरीब और अविकसित राष्ट्रों में गरीबी भुखमरी व कुपोषण भी एक बडा कारण साबित होता है , अस्वाभाविक मौतों के लिए । संस्था बताती है कि आश्चर्यजनक तथ्य ये है कि शहरी क्षेत्रों के मुकाबले अब भी ग्रामीण क्षेत्रों में अस्वाभाविक मौतों की दर बहुत कम है और इसके मुख्य कारण हैं प्राकृतिक आपदाएं और भूमि विवाद के कारण होने वाले अपराध ।

इसके ठीक विपरीत शहरी समाज अपनी बदलती जीवन शैली , नशे का बढता दखल टूटती सामाजिक परंपराएं व संस्थाएं आदि जैसे कारकों की वजह से अस्वाभाविक मौत को आमंत्रण देता सा लगता है । काम के अधिक घंटे , सडकों पर बीतता ज्यादा समय , नशे की नियमितता और फ़िर उसी नशे की हालत में वाहन परिचालन के परिणाम स्वरूप लगातार लोग मौत के मुंह में समाते जा रहे हैं । शराब के अलावा धूम्रपान , पान , बीडी , तंबाकू , गुटखा आदि के सेवन की बढती प्रवृति कैंसर ,तपेदिक , जैसी बीमाइयों को न्यौता दे रहे हैं , और चिकित्सा सुविधाओं के अत्यधिक महंगे होने के कारण स्थिति और भी अधिक गंभीर होती जा रही है । विशेषकर युवाओं में इसका बढता चलन सबसे अधिक चिंता का विषय है ।

संस्था बताती है कि इस घटनाक्रम में सबसे अधिक चिंतनीय बात ये है कि इन अस्वाभाविक मौतों का दोहरा परिणाम समाज को झेलना पडता है । जब किसी परिवार के किसी भी सदस्य की मृत्यु किसी भी अस्वाभाविक परिस्थितियों में होती है तो परिवार के सदस्यों को गंभीर शारीरिक मानसिक आघात लगता है । संस्था के अनुसार ,पिछले दो दशकों में एकल परिवार का चलन अनिवार्य नियम सा हो गया और इसीलिए जब ऐसे छोटे परिवारों में ,विशेषकर किसी युवा सदस्य की, बच्चों की मौत हो जाती है तो पूरे परिवार में एक बिखराव आ जाता है । कई बार तो ये इतना तीव्र सदमा होता है कि परिवार के अन्य सदस्य के लिए भी किसी अनापेक्षित अस्वाभाविक मौत का कारण बन जाता है ।

किसी भी देश के विकास के लिए ये बहुत जरूरी होता है कि वो अपने मानव संसाधन के समुचित उपयोग के उपाय करे बल्कि उनकी सुरक्षा व सरंक्षण को भी सुनिश्चित करना उसका पहला कर्त्वय है । संस्था ने न सिर्फ़ इसके कारणों व परिणामों पर स्पष्ट विचार रखे बल्कि लगभग चेतावनी वाली शैली में विश्व समुदाय को आगाह किया है कि भविष्य में प्राकृतिक आपदाओं की बढती दर , आतंकी हमलों की संभावना तथा पानी , उर्जा , पेट्रोल आदि की कमी होने जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों के मद्देनज़र अभी से गंभीरतापूर्वक इस पर ध्यान दिया जाए ।

संस्था ने इस स्थिति के कारणों पर बारीकी से अधय्यन करने के बाद इसे रोकने , कम करने के लिए बहुत से उपाय सुझाए हैं । संस्था कहती है कि सरकारें आर्थिक लाभ के लिए , सिगरेट , शराब , तंबाकू के उत्पादों का विक्रय करवाती है इसका परिणाम ये हो रहा है कि धीरे धीरे करके पूरा समाज ही नशे की गिरफ़्त में चला जा रहा है । आज भारत में भी स्थिति ऐसी होती जा रही है कि पुरूषों में कोई मद्यपान या धूम्रपान न करता हो तो वो कौतुहल का पात्र बन जाता है । और अब ये चलन बढते बढते महिला समाज में भी घर करता जा रहा है । नई पीढी अपने अभिभावकों को इसमें लिप्त पाकर बहुत पहले ही इसकी शुरूआत कर देते हैं , जिसका परिणाम ये होता है कि बहुत जल्दी ही वो उस सीमा को लांघ जाते हैं जहां से ये जानलेवा साबित होने लगता है । भारत में लगभग ६७ प्रतिशत सडक दुर्घटनाओं की वजह शराब पीकर गाडी चलाना ही है ।


तो यदि इस पर चरणबद्ध तरीके से काबू पाया जाए तो इस दर को काफ़ी कम किया जा सकता है । चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाओं को सस्ता सुलभ करने से घायल व्यक्तियों के उपचार में तीव्रता आएगी और ये बहुत से उन जानों को मौत के मुंह में से खीच लाएगी जो अब इसके अभाव में प्रतिदिन मर रहे हैं । आपातकालीन व्यवस्था को अचूक और निर्बाध किए जाने पर भी काम किया जाना चाहिए । इसके अलावा और भी बहुत से मुद्दों , जीवन शैली में बदलाव और प्रकृति के सम्मान की परंपरा को बढावा देना , जीवन मूल्यों को समझने और उनका सम्मान किए जाने की भावना को विकसित किए जाने जैसे उपाय बताए । अब देखना ये है कि सरकारें कब चेतती हैं और भविष्य को सुरक्षित करने के लिए काम करना शुरू करती हैं ।

.आखिर क्यों घिसट रहे हैं मुकदमे

विलंबित न्याय : अन्याय समान ...








अभी कुछ समय पहले जब भोपाल गैस कांड में अदालत का फ़ैसला आया तो इस हादसे को बीते पच्चीस छब्बीस बरस बीत चुके थे । आज भारतीय अदालतों में लगभग साढे तीन करोड मुकदमें लंबित हैं , अगर अभी से आने वाले मुकदमों को बिल्कुल रोक दिया जाए यानि ,.कोई भी नया मुकदमा दर्ज़ नहीं किया जाए तो भी लंबित पडे इन मुकदमों को निपटाने में बरसों लग जाएंगे । किसी भी आजाद देश के लिए , जो कि विकास पथ पर अग्रसर है उसके लिए ये बहुत ही जरूरी हो जाता है कि आम आदमी को सुलभ और त्वरित न्याय दिलाने के लिए राज्य न सिर्फ़ इसका समुचित प्रबंध करे बल्कि इसके लिए दीर्घकारी योजनाएं भी बनाए । अफ़सोस कि आज भी एक आम आदमी को अमूमन तौर पर अपने मुकदमे के निपटारे के लिए निर्धारित समय सीमा का कम से कम ढाई से तीन गुना विलंब तो होता ही है । खुद कानूनविद इसके बहुत सारे कारण मानते और गिनवाते हैं ।

जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड ..जैसे सूत्र का प्रयोग सबसे पहले विलियम पेन्न से संबंधित और विलियम एवर्ट ग्लैड्स्टन द्वारा प्रतिपादित बताते हैं , जो मैग्नाकार्टा के खण्ड -४० में भी परिलक्षित हुई थी । इसका तात्पर्य ये है कि - " पीडित को युक्तियुक्त समय के भीतर न्याय सुलभ होना चाहेइ । समय से न्याय न मिलना, व्यवहारत: न्याय से वंचित करने जैसा ही है । जबकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३९ मे राज्य और प्रशासन से ये अपेक्षा की गई है कि वह सभी नागरिकों को समान न्याय व नि:शुल्क विधिक सहायता उपलब्ध कराए , और अफ़सोस व दुख की बात ये है कि दोनों ही दृष्टिकोण से राज्य इसमें बुरी तरह से असफ़ल रहा है । आज भारतीय न्यायिक व्यवस्था , मुकदमों के बोझ , और विधायिका एवं कार्यपालिका के नकारेपन के कारण आम नागरिकों की बढी अपेक्षा के बीच जैसे चरमरा सी गई है ।

कानूनविद और विधि विशेषज्ञ अपने अध्ययन के आधार पर भारतीय न्यायपालिका की कच्छप गति के लिए कुछ विशेष कारणों को ही जिम्मेदार मानते हैं । इनमें सबसे पहला कारण खुद सरकार ही है । यहां ये बताना समीचीन होगा कि , देश में आज लंबित लगभग साढे तीन करोड से ज्यादा मुकदमों के लिए खुद सरकार ही सबसे ज्यादा जिम्मेदार है , क्योंकि इन लंबित मुकदमों में से एक तिहाई मुकदमों में सरकार खुद एक पक्ष है । विधि विशेषज्ञ मानते हैं कि , सरकार को अविलंब ही इस दिशा में काम करना चाहिए और न सिर्फ़ फ़ालतू व जबरन दर्ज़ किए कराए मुकदमों को वापस लिए जाने की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए बल्कि एक ऐसी व्यवस्था भी करनी चाहिए , एक स्क्रूटनाइज़ेशन जैसी व्यवस्था जो अपने स्तर पर जांच करके , सरकार को वादी प्रतिवादे बनने से बचने में मदद करे और अनावश्यक अपील करके उसे लंबा करते चले जाने में भी ।



विधिवेत्ता मानते हैं कि भारतीय न्याय व्यवस्था में किसी भी निरपराध को सज़ा से बचाने के लिए बहुस्तरीय न्याय व्यवस्था का प्रावधान किया गया । ये न सिर्फ़ मुकदमों के निस्तारण को बेहद धीमा बल्कि इसे बहुत खर्चीला भी बना देता है । एक आकलन के अनुसार , यदि किसी मुकदमे को अपने सारे स्तरों से गुजरना पडे तो को मौजूदा स्थितियों में कम से कम पांच से आठ वर्षों का समय लगना तो निश्चित है । बढती जनसंख्या और उससे भी ज्यादा समाज में बढते अपराध , लोगों का अपने विधिक अधिकारों के प्रति सजगता में आई तेज़ी , देश में अदालतों और न्यायाधीशों की घोर कमी , अधीनस्थ न्यायालयों में ढांचागत सुविधाओं क अघोर अभाव , न्यायाधीशों व न्यायकर्मियों को मूलभूत सुविधाओं की अनुपलब्धता के कारण उनकी कार्यकुशलता तथा मनोभावों पर पडता नकारात्मक प्रभाव , न्यायपालिका में तेज़ी से बढता भ्रष्टाचार , आदि कुछ ऐसे ही मुख्य कारण हैं जिन्होंने अदालती कार्यवाहियों को दिन महीनों की तारीखों में उलझा कर रख दिया है ।


हालांकि , न्यायप्रक्रिया को गति प्रदान करने के उद्देश्य से सरकार ने पिछले वर्ष राष्ट्रीय वाद नीति की शुरूआत की है और अभी हाल ही में कानून मंत्री ने मिशन मोड योजना जैसे कार्यक्रमों की शुरूआत की है , लेकिन विधि विशेषज्ञ इनसे बेहतर कुछ उपाय अपनाने की ओर ईशारा करते हैं । कानूनविद मानते हैं कि सरकार को सबसे पहले देश में ज्यादा से ज्यादा अदालतों के गठन के साथ ही , न्यायाधीशों की नियुक्ति , रिक्त स्थानों को भरने की तुरंत व्यवस्था करनी चाहिए । आज मुकदमों के निस्तारण के लिए भारतीय न्यायपालिका द्वारा अपनाए जा रहे सभी वैकल्पिक उपायों , जैसे , मध्यस्थता की प्रक्रिया , लोक अदालतों का गठन , विधिक सेवा का विस्तार , ग्राम अदालतों का गठन , लोगों में कानून एंव व्यवस्था के प्रति डर की भावना जाग्रत करना , प्रशासन द्वारा अपराध की रोकथाम हेतु गंभीर प्रयास , अदालती कार्यवाहियों में स्थगन लेने व देने की प्रवृत्ति में बदलाव , अधिवक्ताओं द्वारा हडताल , बहिष्कार जैसी प्रवृत्तियों को न अपनाए जाने के प्रति किए जाने वाले उपाय आदि से अदालत में सिसक और घिसट रहे मुकदमों में जरूर रफ़्तार लाई जा सकेगी , लेकिन ऐसा कब तक हो पाएगा ये बहुत बडा प्रश्न है ।

लो फ़िर दे गया आदेश

लो फ़िर दे गया आदेश किसी को , कोई पाकिस्तानी आका ,
अजमल , अफ़ज़ल , को ज़िंदा रखो , करें रोज़ शहर में धमाका


राजा , कलमाडी , मोझी , रेड्डी , और आज गए अमर ,
अजब देश की गजब कहानी , जेल में अब सिर्फ़ नेता आते नज़र .
बहिन जी का जुत्ती आया , धर के हवाईजहाज ,
विकीलीक्ज़ को आगरा भेजो , खोल दिहिस सब राज़ ...
आजकल बस एक ही बात , इकदूजे से ,पूछें जेल के संतरी ,
कित्ता स्कोर हो गया टोटल , अबे कितने आ गए मंतरी ...
लो फ़िर दे गया आदेश किसी को , कोई पाकिस्तानी आका ,
अजमल , अफ़ज़ल , को ज़िंदा रखो , करें रोज़ शहर में धमाका ...
कै ठो नयका प्रपोजल ले के ,पिरधान जी,चले थे ढाका ,
रूठ के ममता बैठ गईं , लुट गए मोहन काका ...
अमर जी मांगे थे छूट , रे हमरी एक किडनी है फ़ेल ,
अदालत बोली , एक किडनी वाले भी जा सकते हैं जेल .....
तुम कमज़ोर , हो कायर भी , निर्दोंषों को छुप कर देते मार ,
तुम निश्चिंत , तुम बेफ़िक्र , क्योंकि फ़िर बचा लेगी सरकार ,
आम आदमी ही बस क्यों रहता , निशाने पर हर बार ,
कभी उन्हें भी मौत दो , जो देते तुम्हें हथियार ......
कोई घडियाली टसुए बहा रहा होगा ,
क्या किया , क्या करना है , बता रहा होगा ,
कल वही , उसी हैवान की बगल में ,
किसी ज़ेल में भी , कहकहे लगा रहा होगा
अब क्यों सुनें और क्या सुनें तुम्हारी ,
तुम्हारी ही सुन कर तो इतने जीवन बर्बाद हुए ,
अबे छोडो , हर बार वही बकवास करते हो , तुमसे तो,
नए जुमले भी अब तक नहीं ईज़ाद हुए .




पिरधान जी पिरेसान थे , केतना सताया टू जी ,
ये जी जी की आदत गले पडे ,अब आ गए हू जी

”काम करने से नहीं, चमचागिरी से बची रहती है नौकरी”

‘मूंगफली तोड़नी नहीं और पगार छोड़नी नहीं’ के सिद्धांत पर चलने वाला कर्मचारी ही जीवन में सच्चे कामचोर का दर्जा पा सकता है। हालांकि इससे नुकसान होते हैं, लेकिन कामचोरी जैसे परम आनंद के आगे सबकुछ फीका पड़ जाता है। यही काम अगर बॉस की निगरानी, कहने का मतलब शागिर्दी में हो, तो क्या कहना। हनुमंत शुक्ला ऐसे ही बॉस हैं, जिन्हें ‘ऐसा कोई सगा नहीं, जिसको हमने ठगा नहीं’ की उपाधि और उपलब्धि इंटर में पढ़ाई के दौरान ही हासिल हो गई थी। नौकरी में आते-आते आलसी भी हो गए। आलसी भी इतने कि सड़क पर उबासी लेने के दौरान कोई बदतमीज चिड़िया अगर बीट कर दे, तो जब तक नगर निगम का कर्मचारी माफी मांगने के साथ उनका मुंह न धुला दे। आगे नहीं बढ़ते। कई बार ऑफिस लेट आने का हनुमंत शुक्ला का यह बहाना मैनेजमेंट के सामने बिलकुल सटीक बैठा है, ‘क्या बताऊं, आज मेरा पैर गऊ माता के द्रव्य प्रसाद पर पड़ गया, इसलिए मीटिंग में नहीं आ सका।’ इस पर कोई यह सवाल भी दाग सकता है, ‘पैर धोकर भी आ सकते थे ऑफिस। भाई कौन ऐसे अपवित्र हो गए थे कि गंगा नहाने जैसा काम करना पड़ा। ‘ … लेकिन बॉस होने के कारण हनुमंत शुक्ला को समझाना हाथी को बाथरूम में नहलाने जैसा है। अगर कोशिश करूं तो हाथी को बाथरूम में नहला भी सकता हूं, लेकिन बॉस को समझाना…। ‘न बाबा ना, क्योंकि बॉस इज ऑलवेज राइट। अगर बॉस अनजाने ही घोड़े को घोड़ी कह दे, तो बॉस को समझाने की बजाय घोड़े का लिंग बदलवाना ज्यादा फायदे का सौदा होता है।

कर्मचारी का चोला उतारकर बॉस का पद पर पाए ज्यादा दिन नहीं हुआ है। हनुमंत शुक्ला बॉस होने के साथ थोड़े दिन इस अकड़ में रहे कि ‘मैं बॉस हो गया हूं।’ थोड़े दिनों तक हनुमंत शुक्ला ने अपने जूनियर और सबोर्डिनेट के सामने ऐसी हनक दिखाई कि उनका टैरर मैनेजमेंट को खुश कर गया। उन्हें देखकर लोग जल्द ही बॉस की परिभाषा कुछ इस तरह देने लगे, ‘थोड़ी सी अकड़ + बदतमीजी + प्रमोशन से दिमाग खराब = बॉस होता है।’ जल्द ही हनुमंत शुक्ला का यह भ्रम टूट गया, जब जबरदस्त पैरवी पर उनके भी बॉस आ गए। व्यवहार मे वे उसके भी बॉस या कहें बाप निकले। यही से हनुमंत का अंगुलिमाल की तरह हृदय परिवर्तन हो गया। … और बहुत जल्द उन्हें यह अहसास हो गया कि आखिरकार मैं भी एक कर्मचारी हूं। कहावत भी है, ‘कुत्ते के दिन आते हैं और जाते भी है और ऊंट की औकात तब तक, जब तक कि उससे ऊंचा पहाड़ नहीं मिलता।’

बस यहीं से हनुमंत ने अपने बॉस को मक्खन लगाना शुरू कर दिया। और देखते-देखते वे फिर से आला दर्जे के कामचोर हो गए। जल्द ही ‘मूंगफली तोड़नी नहीं, पगार छोड़नी नहीं’ के सिद्धांत को नैतिक शिक्षा की तरह अपने जीवन में उतार लिया। इस तरह हनुमंत से बॉस और जूनियर दोनों खुश। पिछले तीन साल से वे एक ही जगह टिके हुए हैं, बिना कोई काम किए। साथ में तीन प्रमोशन भी मिल चुका है। हनुमंत को प्रमोशन क्यों और कैसे मिले? यह सवाल कौन बनेगा के लिए सुरक्षित है, जिसमें प्रतियोगी से सवाल किया जाएगा। हनुमंत शुक्ला को प्रमोशन को प्रमोशन किस आधार पर मिला?

ऑप्शंस
ए- चाटुकारिता
बी- चमचागिरी
सी- मक्खनबाजी
डी- इनमें से सभी
इस अंतिम सवाल का सही जवाब देकर एक प्रतियोगी करोड़पति हो जाएगा।

खैर, अब हनुमंत शुक्ला के नक्श-ए-कदम पर चलते हुए उनके जूनियर भी चमचागिरी के नए पायदान चढ़ रहे हैं। और जो नहीं चढ़ रहे हैं, उन्हीं के दम से ऑफिस की इज्जत बची पड़ी है। वरना हनुमंत अपने बॉस की नजर में कुख्यात कर्मी हैं और उन्हें दो बार सर्वश्रेष्ठ कर्मचारी का खिताब भी मिल चुका है। दरअसल, हनुमंत काम करने के दौरान काम चालू रखने का ऐसा माहौल तैयार करते हैं और इस दौरान खूब शोर करते हैं। इस गलती पर इस चीखे, उस गलती पर उस पर चीखे… यह सब करने के दौरान काम ठप पड़ जाता है। इससे साथी कर्मियों और मैनेजमेंट को लगती है कि यही शक्स काम कर रहा है, बाकी सब कामचोर हैं। उन्होंने जो कुछ अनुभव किया, सब अपने जूनियरों को भी सिखा दिया। सीखने-सिखाने का सिलसिला जारी है।

आज ही की घटना को लीजिए। आज हनुमंत शुक्ला ऑफिस में लेट आए। उनके साथी सक्सेना जी ने कहा, ‘सर आपको याद कर रहे हैं।’ हनुमंत भी मूड में थे, सो झनझनाती जवाब भी दे दिया। ‘याद स्वर्गीय को किया जाता है, हम तो अभी जिंदा हैं सक्सेना। सर मुझसे मिलना चाहते होंगे।’ ‘ हां-हां’ कहते हुए सक्सेना हनुमंत के सेंर ऑफ ह्यूमर को ताड़ गए और बेवजह ही ठहाका मार कर हंस पड़े।

उधर, हनुमंत बॉस के कमरे में 12.20 मिनट पर बदहवास दाखिल हुए और बोले, ‘सर गुड मॉर्निंग’ यह सुनकर बॉस को गुस्सा आया, आटे में नमक की तरह। यहां तक तो ठीक था, लेकिन वाटर प्रूफ से लैस बॉस के हाथ में बंधी घड़ी, भरी दोपहरी में 12.20 मिनट पर ‘सर गुड मॉर्निंग’ सुनकर पानी-पानी हो गई, गनीमत रही कि खराब नहीं हुई।

इस बीच सुपर बॉस बोले, ‘क्या इरादा है’ हनुमंत तुरंत बोल पड़े, ‘सर सेलरी मिलते ही गर्मी की छुट्टियों में घूमने जाने का इरादा है।’ यह सुनते ही सुपर बॉस की आंखों में चमक आ गई। बोले, ‘ भई हनुमंत मेरे बीवी, बच्चों का भी टिकट करवा देना। मैं भी तुम्हारे साथ चला चलूंगा।’

‘ हो जाएगा सर’। यह कहते हुए हनुमंत सुपर बॉस के केबिन से बाहर निकले और काम में तल्लीन सक्सेना जी को टोकते हुए कहा, ‘सक्सेना जी मैं कुछ दिनों के लिए छुट्टियों पर जा रहा हूं, ऑफिस की जिम्मेदारी मुझ पर है।’

इतना कहने के साथ ही हनुमंत शुक्ला ऑफिस से ऐसे गायब हो गए, जैसे दिन में तारे। ठीक 5 मिनट बाद अपने केबिन से निकले और काम में तल्लीन सक्सेना जी को बिना कोई आदेश दिए निकल गए। सक्सेनाजी ठगे से रह गए। साथियों ने सक्सेना से सहानुभूति जताने की बजाय उन्हें हिकारत भरी नजर से देखा और सभी बाहर निकल गए सुपर बॉस के साथ हनुमंत शुक्ला को हैप्पी जर्नी कहने…