रविवार, 7 मार्च 2010

आखिर क्यों बने मूर्ति रक्षा दल जब ऐसे अनुयाई हो.

आरा से यह तस्वीर दीपक कुमार के सौजन्य से प्राप्त हुई है। जयप्रकाश नारायण की मूर्ति है। जन्मशति के मौके पर उनके अनुयायी आस्था व्यक्त कर रहे हैं। जयप्रकाश नारायण के जितने भी सत्ताधारी चेले हुए वो सब फटीचर गति को प्राप्त हुए लेकिन तस्वीर में दिख रहे लोग पता नहीं क्यूं जेनुइन मालूम पड़ते हैं। इसी खौफ से बहन कुमारी मायावती मूर्ति रक्षा दल बना रही हैं ताकि इस तरह के दिन न देखने पड़े। लेकिन उन्हें भी समझना चाहिए,जब तक इस तरह के अनुयायी बचे रहेंगे,मूर्ति का बचाखुचा कोई भी हिस्सा आस्था व्यक्त करने के काम आता रहेगा। मुझे यह तस्वीर ग़ज़ब की लगी। इस मूर्ति के नीचे से किसी भी प्रकार के लोकतांत्रिक विचार आ जा सकते हैं। दो खंभों पर खुद को टिकाने का ही तो जेपी ने प्रयोग किया था। दो तरह के विचारों को भी।

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

अब दलित नाम की माया

राजनाथ सिंह भी अब दलितों के घर खाने लगे हैं। राहुल गांधी तो खा ही रहे हैं। आजकल दलित फूड काफी चल निकला है। पोलिटिकली। पंजाब के उभार के दिनों में जब वहां के ट्रक ड्राईवर देशाटन पर निकलें तो पंजाबी ढाबा खुल गए। अब दलित ढाबा और दलित रिसोर्ट खोलने का टाईम आ गया है। दलित व्यंजन। मेनू में दलित नेताओं के नाम पर रखें जायें। फूले फुल्का। अंबेडकर आचार। मायावती मलाई। कांशीराम ककड़ी। शाहू पनीर। इन महापुरुषों के नाम पर बने इन व्यंजनों को तभी परोसा जाए जब खाने वाला कोई नेता इनकी एक किताब पढ़ ले। दलित ढाबे में बनाने वाले भी दलित होंगे। जो खायेगा उसे मैनेजर के साथ फोटे खिंचवा कर दिया जाएगा ताकि वे अपनी पार्टी के नेताओं को दिखा सकें। वहां पर सारे महापुरुषों की मूर्तियां भी लग सकती हैं। हर महापुरुष के हिसाब से उनके इलाके का व्यंजन हो। ये भी एक आइडिया हो सकता है। यानी अगर आप देश भर के सभी दलित महापुरुषों के इलाके का व्यंजन खा लें तो बड़े पोस्ट के दावेदार हो सकते हैं। दलित रिसोर्ट अच्छा आइडिया है। इसमें आप स्विमिग पूल में नहाने से लेकर शराब पीने की व्यवस्था हो और दलित चिंतन के एक्सपर्ट बुला कर लंबे लंबे भाषण सुनायें जायें। फिर अगले दिन दोपहर उनका टेस्ट हो और पास हो जाएं तो सर्टिफिकेट मिले। यह लिखा हुआ कि अमुक शर्मा ने पांच प्रकार के दलित व्यंजनों का किया है और पांच किस्म के विशेषज्ञों का भाषण भी सुना। बोर्ड लगा दे कि हमारे यहां दलित भोजन का उत्तम प्रबंध है। उचित दर की दुकान। खाने पीने को लेकर दलित आत्मविश्वास वैसे ही नहीं झलकता है। मेरी एक परिचित हैं जो होटल चलाती हैं। उनसे कहा कि आप पर स्टोरी करूंगा तो महिला ने कहा कि लोग जान जायेंगे तो खाना खाने नहीं आएंगे।


शुरू में तो ये भोजन विश्राम यात्रा ठीक लगी लेकिन अब यह दलितों को जानने के अलावा नौटंकी लगने लगी है। इसलिए नहीं कि ठाकुर राजनाथ सिंह भी खाने लगे हैं बल्कि इसलिए कि हो क्या रहा है। राजनाथ सिंह कब से दलितों के बारे में बात करने लगे। एक तरफ वो दलितों के घर खाना खाते हैं और दूसरी तरफ कहते हैं कॉमनवेल्थ गेम्स में बीफ मत परोसो। उन्हें खाने के संस्कारों की विविधता के बारे में कुछ नहीं मालूम। वो धर्म और जाति की राजनीति का कॉकटेल अब तो न बनायें। चार साल तक बीजेपी के अध्यक्ष रहते हुए तो कुछ किया नहीं। अब फोटोकॉपी पोलिटिक्स कर रहे हैं।


लेकिन क्या यह ठोस उपाय है? सारे गांवों की बसावट जात के आधार पर है। बहुत पहले मैंने इस ब्लॉग पर लिखा भी था कि गांवों की पारंपरिक बसावट को ध्वस्त कर दिया जाए और एक नया मास्टर प्लान बने। गांवों में इस तरह से घरों को बसाया जाए ताकि एक घर पंडित का हो और दूसरा दलित का, उसका पड़ोसी ठाकुर का। वैसे भी सरकार इंदिरा आवास योजना के तहत गरीबों के लिए घर बनवाती ही है। कई सरकारी योजनाएं हैं जिनके तहत गांवों में गरीबों के लिए घर बनते हैं। इन घरों को गांव के किसी छोर पर न बनाया जाए। आज भी इंदिरा आवास के घर दलितों की बस्ती में ही बनते हैं। ये चलन तुरंत बंद होना चाहिए। इंदिरा आवास के तहत सभी जाति के गरीबों को घर मिले। जब तक हम बसावट में मिलावट नहीं करेंगे, दलितों को जानने के लिए उनकी बस्तियों में जाते ही रह जाएंगे। अलग से जाकर नौटंकी करने की ज़रूरत न पड़े इसलिए गांवों की बसावट को ध्वस्त करने की योजना पर काम करना चाहिए। बवाल होगा तो होगा। ठाकुर साहब का घर एक छोर पर और जाटव जी का एक छोर पर नहीं चलेगा।

लेबल असली, दवा नकली

राजेश त्रिपाठी
कोटा। अस्पतालों में बीमारियों से जूझ रहे गंभीर रोगियों को "जिंदगी" देने वाली दवा भी उनकी जिंदगी को "खतरा" पैदा कर सकती है। गत वर्ष कोटा में जब्त हुई एंटीबायोटिक दवा जांच में "नकली" साबित हुई। संभवत: कोटा में अब तक का ये पहला मामला है। जिंदगी के दुश्मन "असली" की आड़ में "नकली" दवा बेचकर "चांदी" कूट रहे हैं। हो सकता है कि अभी भी ये नकली दवाएं बाजार में धड़ल्ले से बिक रही हों! हुआ यूं कि औषधि नियंत्रण विभाग की ओर से गत वर्ष एमबीएस अस्पताल में जब्त एंटीबायोटिक दवा हाल ही आई जांच रिपोर्ट के अनुसार सरकारी प्रयोगशाला में "नकली" निकली है। दरअसल जो दवा लिखी गई थी, उसी का लेबल शीशी पर लगा था, लेकिन शीशी के अंदर कोई और दवा निकली। औषधि नियंत्रण विभाग ने कार्रवाई के लिए जयपुर के औषधि नियंत्रक से अनुमति मांगी है। रिपोर्ट आने के बाद दवा विक्रेताओं में भी हड़कम्प मचा हुआ है।
ये था मामला
अस्पताल के ईएनटी वार्ड में बारां जिले के नारायणपुरा गांव निवासी सत्यनारायण पांचाल का कान का ऑपरेशन हुआ था। ऑपरेशन से पूर्व 31 जुलाई 2009 को विभागाध्यक्ष के निर्देश पर कंपाउण्डर द्वारा लिखी दवाइयां परिजनों ने नयापुरा स्थित आदित्य मेडिकल स्टोर से खरीदी। दवाओं में ब्रांडेड इंजेक्शन "आईक्यू जिड" भी था। एक अगस्त को ऑपरेशन के बाद वार्ड नर्स ने नकली होने की आशंका जताते हुए इंजेक्शन लगाने से इनकार कर दिया। बाद में औषधि निरीक्षक ने जांच के लिए दवा का सैंपल लिया था।
ये थी गड़बड़ी
दवा की शीशी के लेबल के अनुसार दवा में सेप्टीजाइडिम साल्ट होना चाहिए था, लेकिन जांच में सेप्ट्रामऑक्सिन साल्ट पाया गया। दोनों एंटीबायोटिक हैं, लेकिन गुणवत्ता में काफी अंतर है। जांच में ऎसा माना गया कि दवा कंपनी में नहीं बनी। सारा हेरफेर कोटा में ही किया गया।
कूट रहे चांदी
नकली दवाओं के इस खेल में दवा विक्रेताओं व अन्य लोगों की मिलीभगत से इनकार नहीं किया जा सकता। लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करते हुए ये लोग "चांदी" कूटने में लगे हुए हैं। सेप्टीजाइडिम की वायल 290 रूपए की आती है और सेप्ट्रामऑक्सिन की वायल 30 रूपए की। यानि रोगी को 30 रूपए की दवा 290 रूपए में बेच दी जाती है। कई बार इन दवाइयों से रोगी को गंभीर नुकसान भी हो जाता है, लेकिन इसकी परवाह किसे है।
कब-कब आए नकली दवा के मामले
* 2007 में पुलिस ने शिवपुरा के एक मकान से नकली के संदेह में दवाएं जब्त की। मामले में पुलिस ने बाद में रूचि नहीं ली।
* 22 जुलाई 2009 में एंटीबायोटिक दवा के नकली होने के संदेह में एमबीएस अस्पताल में हंगामा।
* 2 अगस्त 2009 एमबीएस के ईएनटी वार्ड से नकली होने के संदेह में दवा जब्त की।
* औषधि नियंत्रण विभाग ने अभियान चला कर जनवरी में कोटा संभाग में 15 दवाओं के सैंपल लिए।
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यह दवा नयापुरा स्थित आदित्य मेडिकल स्टोर से खरीदी गई थी, जो जांच में नकली पाई गई। दुकान के संचालक उपेन्द्र पारेता के खिलाफ अदालत में चालान पेश करने की औषधि नियंत्रण कार्यालय से अनुमति शीघ्र मिलने की आशा है।-देवेन्द्र गर्ग, औषध निरिक्षका

ये है इरफ़ान की नज़र..........




बुधवार, 3 मार्च 2010

थ्री इटियॉटिक

साढ़े चार स्टार्स की फ़िल्म देख रहा था। तारे छिटकते थे और फिर कहीं कहीं जुड़ जाते थे। साल की असाधारण फिल्म की साधारण कहानी चल रही थी। चार दिनों में सौ करोड़ की कमाई का रिकार्ड बज रहा था और दिमाग के भीतर कोई छवि नहीं बन पा रही थी। थ्री इडियट्स की कहानी शिक्षा प्रणाली को लेकर हो रही बहसों के तनाव में कॉमिक राहत दिलाने की सामान्य कोशिश है। कामयाबी काबिल के पीछे भागती है। संदेश किसी बाबा रणछोड़दास का बार बार गूंज रहा था। पढ़ाई का सिस्टम ख़राब है लेकिन विकल्प भी बहुत बेकार। इसी ख़राब सिस्टम ने कई प्रतिभाओं को विकल्प चुनने के मौके दिये हैं। इसी खराब सिस्टम ने लोगों को सड़ा भी दिये हैं। लेकिन यह टाइम दूसरा है। हम विकल्पों के लिए तड़प रहे हैं। लेकिन क्या हम वाकई विकल्प का कोई मॉडल बना पा रहे हैं? सवाल हम सबसे है। मद्रास प्रेसिडेंसी में सबसे पहले इम्तहानों का दौर शुरू हुआ था। अंग्रेजों ने जब विश्वविद्यालय बनाकर इम्तहान लिये तो सर्वण जाति के सभी विद्यार्थी फेल हो गए। उसी के बाद पहली बार थर्ड डिविज़न का आगमन हुआ। हिंदुस्तान में सर्टिफिकेट आधारित प्रतिभा की यात्रा यहीं से शुरू होती है। डेढ़ सौ साल से ज़्यादा के इतिहास में परीक्षा को लेकर हमने एक समाज के रूप में तनाव की कई मंज़िलें देखी हैं। ज़िला टॉपर और पांच बार मैट्रिक फेल अनुभव प्राप्त प्रतिभावान और नाकाबिल हर घर परिवार में रहे हैं। दिल वाले दुल्हनियां ले जायेंगे में अनुपम खेर अपने खानदान के सभी मेट्रिक पास या फेल पूर्वजों की तस्वीरें लगा कर रखते हैं। शाह रूख खान को दिल की सुनने के लिए भेज देते हैं। पंद्रह साल पहले आई यह कहानी सुपरहिट हो जाती है। अनुपम खेर शाहरूख खान से कहते है कि जा तू मेरी भी ज़िंदगी जी कर आ। शिक्षा व्यवस्था से भागने के रास्ते को लेकर कई फिल्में बनीं हैं। भागने के कई रास्ते भी हैं।थ्री इडियट्स फिल्म पूंजीवादी सिस्टम को रोमांटिक बनाने का प्रयास करती है। काबिलियत पर ज़ोर से ही कामयाबी का रास्ता निकलता है। काबिल होना पूंजीवादी सिस्टम की मांग है। रणछोड़ दास का विकल्प भी किसी अमेरिकी कंपनी की कामयाबी के लिए डॉलर पैदा करने की पूंजी बन जाता है। कामयाबी के बिना ज़िंदा रहने का रास्ता नहीं बताती है यह फिल्म। शायद ये किसी फिल्म की ज़िम्मेदारी नहीं होती। उसका काम होता है जीवन से कथाओं को उठाकर मनोरंजन के सहारे पेश कर देना। ताकि हम तनाव के लम्हों में हंसने की अदा सीख सकें। बीसवीं सदी के शुरूआती दशकों में ही प्रेमचंद की कहानी आ गई थी। बड़े भाई साहब। इम्तहान सिस्टम पर बेहतरीन व्यंग्य। बड़े भाई साहब अपने छोटे भाई साहब को नए सिस्टम में ढालने के बड़े जतन करते हैं। छोटा भाई कहता है कि इस जतन में वो एक साल के काम को तीन तीन साल में करते हैं। एक ही दर्जे में फेल होते रहते हैं। लिहाजा खेलने-कूदने वाला छोटा भाई हंसते खेलते पास होने लगात है और बड़े भाई के दर्जे तक पहुंचने लगते हैं। कहानी में बड़े भाई का संवाद है। गौर कीजिएगा। "सफल खिलाड़ी वह है,जिसका कोई निशाना खाली न जाए। मेरे फेल होने पर न जाओ। मेरे दरजे में आओगे, तो दांतों पसीना आ जाएगा। जब अलजेबरा और ज्योमेट्री के लोहे के चने चबाने पड़ेंगे. इंग्लिस्तान का इतिहास पढ़ना प़ड़ेगा। बादशाहों के नाम याद रखना आसान नहीं, आठ-आठ हेनरी हुए हैं। कौन सा कांड किस हेनरी के समय में हुआ, क्या यह याद कर लेना आसान समझते हो। हेनरी सातवें की जगह हेनती आठवां लिखा और सब नंबर गायब। सफाचट। सिफर भी न मिलेगा,सिफर भी। दर्जनों तो जेम्स हुए हैं,दर्जनों विलियम,कौड़ियों चार्ल्स। दिमाग चक्कर खाने लगता है।"भारतीय शिक्षा प्रणाली को लेकर ऐसे किस्से इसके आगमन से ही भरे पड़े हुए हैं। प्रेमचंद की यह कहानी बेहतरीन तंज है। उस वक्त का व्यंग्य है जब इम्तहानों का भय और रूटीन आम जीवन के करीब पहुंच ही रहा था। थ्री इडियट्स की कहानी तब की है जब इम्तहानों को लेकर देश में बहस चल रही है। एक सहमति बन चुकी है कि नंबर या टॉप करने का सिस्टम ठीक नहीं है। दिल्ली के सरदार पटेल में कोई टॉपर घोषित नहीं होता। किसी को नंबर नहीं दिया जाता। ऐसे बहुत से स्कूल हैं जहां मौजूदा खामियों को दूर किया गया है या दूर करने का प्रयास हो रहा है। इसी साल सीबीएसई के बोर्ड में नंबर नहीं दिये जायेंगे। उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश में बोर्ड के इम्तहानों में करीब बीस लाख से ज़्यादा बच्चे फेल हो गए थे।इन सभी हकीकतों के बीच आमिर की यह फिल्म एजुकेशन के सिस्टम को कॉमिक में बदल देती है। जो मन करो वही पढ़ो। यही आदर्श स्थिति है लेकिन ऐसा सिस्टम नहीं होता। न पूंजीवाद के दफ्तर में और न कालेज में। अभी तक कोई ठोस विकल्प सामने नहीं आया है। प्रतिभायें कालेज में नहीं पनपती हैं। यह एक मान्य परंपरा है। थ्री इडियट्स मौजूदा सिस्टम से निकलने और घूम फिर कर वहीं पहुंच जाने की एक सामान्य फिल्म है। जिस तरह से तारे ज़मीन पर मज़ूबती से हमारे मानस पर चोट करती है और एक मकसद में बदल जाती है,उस तरह से थ्री इडियट्स नहीं कर पाती है। चंद दोस्तों की कहानियों के ज़रिये गढ़े गए भावुकता के क्षण सामूहिक बनते तो हैं लेकिन दर्शकों को बांधने के लिए,न कि सोचने के लिए मजबूर करने के लिए। फिल्मों के तमाम भावुक क्षण खुद ही अपने बंधनों से आजाद हो जाते हैं। जो सहपाठी आत्महत्या करता है उसका प्लॉट किसी मकसद में नहीं बदल पाता। दफनाने के साथ उसकी कहानी खतम हो जाती है। कहानी कालेज में तीन मसखरों की हो जाती है जो इस सिस्टम को उल्लू बनाने का रास्ता निकालने में माहिर हैं। ऐसे माहिर और प्रतिभाशाली बदमाश हर कालेज में मिल जाते हैं। चेतन भगत की दूसरी किताब पढ़ी है। टू स्टेट्स। थ्री इडियट्स की कहानी अगर पहली किताब फाइव प्वाइंट्स समवन से प्रभावित है तो यह साबित हो जाता है कि फिल्म आईआईटी में गए एक कामयाब लड़के की कहानी है जो आईआईटी के सिस्टम को एक नॉन सीरीयस तरीके से देखता है। चेतन भगत का इस विवाद में उलझना बताता है कि उसकी कहानियों का यह किरदार लेखक एक चालू किस्म का बाज़ारू आदमी है। क्रेडिट और पैसा। दोनों बराबर और ठीक जगह पर चाहिए। विधू विनोद चोपड़ा का जवाब बताता है कि कामयाबी के लिए क्या-क्या किये जा सकते हैं। परदे पर चेतन को क्रेडिट मिली है।लेकिन कितनी मिली है उसे ईंची टेप से नापा जाना बताता है कि फिल्म अपने मकसद में कमज़ोर है। इसीलिए इस फिल्म की कहानी लगान और तारे ज़मीं पर जैसी नहीं है। हां दोस्ती के रिश्तों को फिर से याद दिलाने की कोशिश ज़रूर है। आमिर खान किसी कहानी में ऐसे फिट हो जाते हैं जैसे वो कहानी उन्हीं के लिए बनी हो। कहानी इसलिए अपनी लगती है क्योंकि कंपटीशन अब एक व्यापक सामाजिक दायरे में हैं। शिक्षा और उससे पैदा होने वाली कामयाबी का विस्तार हुआ है। हम भी कामयाब हैं और आमिर भी कामयाब है। पहले ज़िले में चार लोग कामयाब होते थे,अब चार हज़ार होते हैं। मेरे ही गांव में ज़्यादातर लोगों के पास अब पक्के के मकान है। पहले तीन चार लोगों के होते थे। कामयाबी के सार्वजनिक अनुभव के इस युग में यह फिल्म कई लोगों के दिलों से जुड़ जाती है।भारत महान के प्रखर चिंतकों के लेखों में एक कामयाब मुल्क बनने की ख्वाहिश दिखती है। बीसवीं और इक्कीसवीं सदी का भारत या अगले दशक भारत का। भारत एक मुल्क के रूप में चीन और अमेरिका से कंपीट कर रहा है। ज़ाहिर है नागरिकों के पास विकल्प कम होंगे। सब रेस में दौ़ड़ रहे हैं। आत्महत्या करने वालों की कोई कमी नहीं है। दिमाग फट रहे हैं। सिस्टम क्रूर हो रहा है। काश थ्री इडियट्स के ये किरदार मिलकर इसकी क्रूरता पर ठोस प्रहार करते। लेकिन ये क्या। ये तीनों कहानी की आखिर में लौटते हैं कामयाब ही होकर। अगर कामयाब न होते तो कहानी का मामूली संदेश की लाज भी नहीं रख पाते। बड़ी सी कार में दिल्ली से शिमला और शिमला से मनाली होते लद्दाख। साधारण और सिर्फ सर्जनात्मक किस्म के लोगों की कहानी नहीं हो सकती। ये कामयाब लोगों की कहानी है जो काबिल भी हैं। कामयाब चतुर रामालिंगम भी है। दोनों अंत में एक डील साइन करने के लिए मिलते हैं। एक दूसरे को सलामी ठोंकते हैं। थोड़ा मज़ा भी लेते हैं। वो सिस्टम से बगावत नहीं करते हैं,एडजस्ट होने के लिए टाइम मांग लेते हैं। सिस्टम का विकल्प नहीं देती है यह फिल्म। न ही तारे ज़मीं की तरह सिस्टम में अपने किरदार के लिए जगह देने की मांग करती है। मनोरजंन करने में कामयाब हो जाती है। शायद किसी फिल्म के लिए यही सबसे बड़ा पैमाना है। साढ़े चार स्टार्स की फिल्म।नोट- ज़ुबी डूबी गाना रेट्रो इफेक्ट देता है। ओम शांति ओम से लेकर रब ने बना दी जोड़ी तक में ऐसे प्रयोग हो चुके हैं। इससे पहले भी कई फिल्मों में रेट्रो इफेक्ट के ज़रिये पुरानी फिल्मों के क्लिशे को हास्य को बदला जा चुका है। गाना बेहद अच्छा है।

अपराध का नारीवाद.


क्या आप देख रहे है गुलाम नबी आजाद

कहा गए डॉक्टर सारे......अब दर्ज्जी की दूकान पर होगा बवासीर का इलाज.